annual medical tests diabetes
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कंटेंट की समीक्षा : अश्विनी एस कनाडे ने की है, वे रजिस्टर्ड डाइटीशियन हैं और 17 सालों से मधुमेह से जुड़ी जानकारियों के प्रति लोगों को जागरुक कर रहीं हैं.

भले ही आपको मुश्किल लगे पर डायबिटीज़ से जुड़ी जटिलताओं और बीमारियों से बचना आसान है, ख़ासकर तब जब आप नियमित तौर पर मेडिकल टेस्ट करवाते हैं और शरीर में होने वाले बदलावों से वाकिफ़ रहते हैं. इन टेस्ट को करवाने से ना सिर्फ़ डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियों से बचाव होता है, बल्कि इससे डायबिटीज़ के साथ भी आपको स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने में मदद मिलती है.

डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियों के वो 8 शुरुआती लक्षण जिसे लोग अनदेखा करते हैं.

नई दिल्ली स्थित बीएलके सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की कंसलटेंट डॉ जीवनज्योत बहिया हमारे साथ साझा कर रही हैं, उन टेस्ट की जानकारी जिसे कम से कम साल में एक बार मधुमेह से ग्रस्त सभी व्यक्तियों को करवाना ही चाहिए.

1.  पैरों की जांच:

डायबिटीज़ ग्रस्त लोग अगर अपने पैरों की जांच करवाते रहें तो वो आगे चलकर पैरों को काटने और अल्सर जैसी स्थिति तक पहुँचने से बच सकते हैं. इस तरह की शिकायत या जटिलता ज़्यादातर डायबिटिक लोगों में देखी जाती है. पैरों में स्किन ब्रेक डाउन होना, अल्सर या त्वचा के तापमान में बदलाव वग़ैरह के होने पर चिकित्सक से जांच करवानी चाहिए. साथ ही आपको पैरों की सफ़ाई के बारे में सही जानकारी भी होनी चाहिए और पैरों में किसी भी तरह की चोट लगने से बचना चाहिए.

2.  हीमोग्लोबिन A1C की जांच:

ब्लड शुगर लेवल का पता लगाने और  इसकी निगरानी रखने के लिए HbA1c की जांच या ग्लाइकोसिलेटेड हीमोग्लोबिन टेस्ट किया जाता है. इस टेस्ट के ज़रिये 12 हफ़्तों का एवरेज यानी औसत ब्लड शुगर लेवल पता चलता है. जिन्हें डायबिटीज़ है, उन्हें कम से कम 3 महीने में 1 बार और जिन्हें डायबिटीज़ नहीं है, उन्हें भी कम से कम साल में एक बार यह टेस्ट करवा लेना चाहिए.

जानें, क्या है HbA1c टेस्ट.

 

3.  लिपिड प्रोफ़ाइल टेस्ट:

डायबिटीज़ से ग्रसित लोगों को लिपिड प्रोफ़ाइल टेस्ट हर 6 महीने में एक बार और स्वस्थ व्यक्तियों को साल में एक बार करवाना ही चाहिए. कोलेस्ट्रॉल प्रोफ़ाइल की जांच करना बेहद ज़रूरी होता है, क्योंकि इसके ज़्यादा होने से हार्ट की बीमारी और स्ट्रोक भी होता है, मधुमेह ग्रस्त व्यक्तियों में इसके होने का ख़तरा ज़्यादा होता है. साल में कम से कम एक बार अपने कोलेस्ट्रॉल लेवल और ट्रायग्लिसराइड (ख़ून में एक तरह का फ़ैट) की जांच ज़रूर करवाएं.

4.  किडनी टेस्ट:

स्वस्थ किडनी ख़ून से अनचाही चीज़ों और अतिरिक्त तरल पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती हैं. ब्लड टेस्ट (ख़ून की जांच) की मदद से आपका डॉक्टर आसानी से यह जान पाता है कि आपकी किडनी सही ढंग से अपना काम कर रही है या नहीं. यूरिन टेस्ट से यह पता किया जा सकता है कि अनचाही चीज़ें कितनी जल्दी बाहर निकल रही है और कहीं किडनी में असामान्य मात्रा में प्रोटीन लीक तो नहीं हो रहा. इसलिए इन सब पर नज़र बनाए रखने के लिए सालाना किडनी फ़ंक्शन की जांच करवाने की सलाह दी जाती है.

5. ब्लड प्रेशर लेवल की जाँच:

ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) के बढ़ने से हार्ट से जुड़ी बीमारीयों में बढ़ोतरी और स्ट्रोक का ख़तरा बढ़ सकता है. संतुलित आहार और स्वस्थ जीवनशैली के ज़रिये ब्लड प्रेशर लेवल को सामान्य रखा जा सकता है. साल में कम से कम एक बार ब्लड प्रेशर की जांच करवाने की सलाह दी जाती है, और जिन लोगों में कार्डियोवैस्कुलर यानी दिल से जुड़ी बीमारियों की शिकायत है, उन्हें नियमित तौर पर हर 2 महीने में एक बार अपने ब्लड प्रेशर लेवल की जांच करवानी चाहिए.

6. डाइलेटेड आई एग्ज़ाम:

डायबिटीज़ से ग्रसित लोगों को रेटिनोपैथी से बचाव करने के लिए डाइलेटेड आई एग्ज़ामिनेशन या फ़ंडस एग्ज़ामिनेशन किया जाता है. वयस्कों में डायबिटिक रेटिनोपैथी ही अंधेपन की अहम् वजह होती है. डाइलेटेड आई एग्ज़ाम के लिए सालाना आँखों के डॉक्टर से जांच करवाने का सुझाव दिया जाता है.

7.  दांतों का चेकअप:

डायबिटीज़ में दांतों का ख़याल रखना काफ़ी अहम होता है, आप अगर दांतों से जुड़ी किसी गंभीर तकलीफ़ जैसे ज़ेरोस्टोमिया से गुज़र रहे हैं (मेडिकल की भाषा में ये उस स्थिति को कहते हैं, जिसके दौरान मुंह में जलन महसूस होती है) या अगर मुंह के घाव ठीक होने में ज़्यादा समय लग रहा हो, तो आपमें संक्रमण के आसार ज़्यादा है. ऐसे में डॉक्टर से ज़रूर मिलें. इसके अलावा अगर आपको पेरियोडोंटाइटिस है तो आपकी पैरोटिड लार ग्रंथि का आकार भी बढ़ जाता है; इसलिए हर 6 महीने में दांतों की जांच करवानी चाहिए.

8.  इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम टेस्ट यानी ईसीजी:

हार्ट के इलेक्ट्रिकल और मस्कुलर काम को टेस्ट करने के लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी या ईकेजी) का इस्तेमाल किया जाता है. अगर आपको डायबिटीज़ या हाइपरटेंशन है, तो हर साल आपको ईसीजी टेस्ट कराना चाहिए.

ऊपर बताए गए टेस्ट्स के अलावा, डायबिटीज़ से ग्रसित लोगों को हर 3 महीने में एक बार यूरिन एल्ब्यूमिन क्रिएटिनिन की जांच करवानी ज़रूरी है. डायबिटीक रेनल डिज़ीज़ (यानी किडनी से जुड़ी बीमारी) की पहचान करने के लिए यह एक शुरुआती टेस्ट है. और हाँ, डायबिटिक महिलाओं को हर साल पैप स्मीयर, मैमोग्राफ़ी और थायरॉइड प्रोफ़ाइल टेस्ट भी करवाना चाहिए.

 

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