diabetes test diagnosis
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कंटेंट की समीक्षा अश्विनी एस कनाडे ने की है, वे रजिस्टर्ड डाइटीशियन हैं और 17 सालों से मधुमेह से जुड़ी जानकारियों के प्रति लोगों को जागरूक कर रहीं हैं.

डायबिटीज़ या मधुमेह सबसे आम शारीरिक परेशानियों में एक है. एक अनुमान के मुताबिक़, दुनियाभर में तक़रीबन 179 मिलियन लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि वो डायबिटीज़ के साथ जी रहे हैं. दरअसल, हर 7 सेकेंड पर एक व्यक्ति की डायबिटीज़ के चलते मौत हो जाती है. [1]

यानी हालात गंभीर हैं, लेकिन डायबिटीज़ और उसके स्क्रीनिंग टेस्ट के बारे में जानकारी बढ़ाकर आसानी से हालात पर क़ाबू पाया जा सकता है. फिर चाहे डायबिटीज़ का प्रकार टाइप 1, टाइप 2, जेस्टेशनल (गर्भावस्था से जुड़ा हुआ), या फिर प्री-डायबिटीज़ ही क्यों न हो. अलग-अलग प्रकार से ख़ून की जांच के ज़रिये इनका पता लगाया जा सकता है. हम आपको इस लेख में डायबिटीज़ का पता लगाने वाली ख़ून से जुड़ी अलग-अलग जांचों के बारे में जानकारी दे रहे हैं:

1. फ़ास्टिंग प्लाज़्मा ग्लूकोज़ टेस्ट:

जैसा कि नाम से ही पता चलता है, ये जांच उस वक़्त की जाती है, जब आप भूखे पेट हों, यानी कम से कम 8 घंटों तक आपने कुछ भी न खाया हो. लिहाज़ा फ़ास्टिंग प्लाज़्मा ग्लूकोज़ (एफ़पीजी) टेस्ट सुबह के नाश्ते से पहले किया जाता है.

इस जांच में आपकी किसी उंगली के सिरे से ख़ून निकाला जाता है और उसे ग्लूकोमीटर में लगे एक स्ट्रिप पर डाला जाता है. दूसरे तरीक़े में तकनीशियन आपकी बांह की नस से ख़ून निकालता है. एफ़पीजी टेस्ट से पता चलता है कि जांच के वक़्त आपके ख़ून में कितना शुगर है.

मेयो क्लिनिक के मुताबिक़, निम्न आंकड़े ये बताते हैं कि आपका डायबिटीज़ किस स्टेज पर है:[2]

एफ़पीजी की स्थितिशुगर की मात्रा एमजी/डीएल मेंशुगर की मात्रा एमएमओएल/एल में
सामान्य1005.6
प्री-डायबिटीज़100-1255.6-5.9
डायबिटीज़126 से ज़्यादा7.0 या ज़्यादा


हालांकि रिसर्चर्स का कहना है कि अगर आपका एफ़पीजी 100 से कम है, लेकिन 91-99 एमजी
/डीएल के रेंज में है, तो आपको टाइप2 डायबिटीज़ होने का ख़तरा है.
[3]

2. पोस्टप्रेंडियल ब्लड शुगर टेस्ट (खाने के बाद):

पोस्टप्रेंडियल ब्लड शुगर टेस्ट (पीपीबीएस) एफ़पीजी टेस्ट करने और नाश्ता खाने के बाद किया जाता है. अमूमन ये टेस्ट सुबह नाश्ता करने के दो घंटे बाद किया जाता है.

एक लैन्सेट की मदद से आप ख़ुद अपनी उंगली के सिरे से ख़ून निकाल कर इसकी जांच कर सकते हैं (लैन्सेट ग्लूकोमीटर के साथ ही आता है). ख़ून को ग्लूकोमीटर से लगे स्ट्रिप पर डाला जाता है. अगर आपके आसपास कोई लैब है, तो वहां का तकनीशियन आपके बांह (भुजा) की नस से ख़ून निकाल सकता है.   

पीपीबीएस के आंकड़े:

पीपीबीएस की स्थितिशुगर की मात्रा एमजी/डीएल मेंशुगर की मात्रा एमएमओएल/एल में
सामान्य140 से कम7.8
प्री-डायबिटीज़141-1997.8-11.1
डायबिटीज़200 या इससे ज़्यादा11.1 से ज़्यादा

 

अगर आपको पहले से कोई बीमारी हो, या आपने पीपीबीएस टेस्ट से पहले कोई दवा खाई हो, तो इसकी जानकारी डॉक्टर को ज़रूर दें, क्योंकि इससे आपकी जांच के नतीजों पर असर पड़ सकता है.

3. ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी)

ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट या ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) के ज़रिये ये पता चलता है कि फ़ास्टिंग के बाद किसी व्यक्ति को ग्लोकोज़ दिया जाए तो उसका शरीर इसपर किस तरह की प्रतिक्रिया देता है, क्या उसका शरीर ग्लूकोज़ को पूरी तरह अवशोषित कर पाता है या नहीं. दूसरे शब्दों में कहा जाए, तो ये आपके शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध की जांच करता है. टाइप2 डायबिटीज़ की जानकारी के लिए ये एक मानक टेस्ट है.

इसके लिए तकनीशियन आपके बांह की नस से दो बार ख़ून निकालता है; पहली बार उस वक़्त, जब आपने रातभर कुछ नहीं खाया हो और दूसरी बार कोई मीठी चीज़ पीने के बाद, जो टेस्ट के दौरान आपको दिया जाता है.

लिहाज़ा, इस जांच के दो स्टेप होते हैं:

  • पहले आपका एफ़पीजी टेस्ट होता है (रातभर भूखे रहने के बाद)
  • एफ़पीजी टेस्ट के बाद, आपको चीनी का घोल मिला हुआ ड्रिंक दिया जाता है. फिर 2 घंटे (या 30 से 60 मिनट) के बाद आपके ख़ून में शुगर की जांच की जाती है.

2 घंटे बाद टेस्ट में अगर 140-199 एमजी/डीएल की रीडिंग आती है, तो इसका मतलब है कि आपको प्री-डायबिटीज़ है, और अगर 200 एमजी/डीएल से ज़्यादा की रीडिंग आती है, तो आपको डायबिटीज़ है.

4. रैन्डम प्लाज़्मा ग्लूकोज़ टेस्ट:

रैन्डम प्लाज़्मा ग्लूकोज़ (आरपीजी) टेस्ट भी आपके ख़ून में शुगर का स्तर मापता है, लेकिन इस जांच के लिए कोई ख़ास वक़्त या खाने से जुड़ी पाबंदी शामिल नहीं होती. इसे रैन्डम जांच कहते हैं, क्योंकि इसे दिन में किसी भी वक़्त किया जा सकता है और इस बात की भी चिन्ता नहीं होती, कि आपने कब और क्या खाया था. इस टेस्ट में भी आपकी उंगली के सिरे से ख़ून निकाला जाता है और उसे ग्लूकोमीटर से लगे स्ट्रिप पर डाला जाता है. 200 एमजी/डीएल या उससे अधिक स्तर की रीडिंग का मतलब है कि आपको डायबिटीज़ है.

अमेरिकन एकैडमी ऑफ़ फ़ैमिली फ़िजीशियन्स के मुताबिक़, डायबिटीज़ की सटीक जांच के लिए आपको ओजीटीटी और एचबीए1सी (जिसका ज़िक्र नीचे किया गया है) से जुड़ी जांच लगातार (लगातार 2 दिनों तक) करनी ज़रूरी है. लेकिन अगर एक ही दिन आरपीजी की रीडिंग 200 एमजी/डीएल या उससे ज़्यादा आए, तो समझ लेना चाहिए कि आपको डायबिटीज़ है.[4]

गर्भावस्था की शुरुआत में डायबिटीज़ के ख़तरे की जांच के लिए भी आरपीजी फ़ायदेमंद है, गर्भकालीन मधुमेह को जेस्टेशनल डायबिटीज़ कहते हैं. हालांकि जेस्टेशनल डायबिटीज़ गर्भ के 20 हफ़्ते बाद होता है, लेकिन शुरुआती तीन महीने में किया गया आरपीजी टेस्ट बता सकता है कि बाद में गर्भवती महिलाओं में डायबिटीज़ होगा या नहीं.[5]

जानें, जेस्टेशनल डायबिटीज़ क्या है?

लिहाज़ा, ये सलाह दी जाती है कि गर्भ ठहरने के पहले तीन महीने में जेस्टेशनल  डायबिटीज़ की जांच ज़रूर कराएं, ख़ासकर अगर आपमें निम्न में से किसी दायरे में आते हैं:

  • आपकी उम्र 35 साल या उससे ज़्यादा हो
  • आपका वज़न ज़्यादा या मोटापा हो, ख़ासकर पेट निकला हुआ हो
  • गर्भ से पहले आपका बीएमआई 25 किलोग्राम/मीटर2 से कम हो, लेकिन गर्भ के दौरान वज़न ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाए
  • ब्लड प्रेशर ज़्यादा हो
  • परिवार में टाइप 2 डायबिटीज़ का इतिहास रहा हो
  • पॉलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) हो
  • पहले गर्भपात हुआ हो
  • पहले गर्भावस्था के दौरान जेस्टेशनल  डायबिटीज़ हुआ हो. [6]

अब तक बताए गए सभी टेस्ट जांच के वक़्त आपके ख़ून में शुगर का स्तर बताते हैं. जिस वक्त जांच हुई हो. टेस्ट के ज़्यादा सटीक नतीजों के लिए आपके डॉक्टर आपको कुछ और टेस्ट्स कराने की सलाह दे सकते हैं, जिससे आपके ख़ून में पिछले कुछ हफ़्तों से लेकर कुछ महीनों तक शुगर के स्तर का पता चल सके. इस जांच के बारे में हम आपको विस्तार से बता रहे हैं:

क्या आप ग्लूकोमीटर का सही तरीक़े से इस्तेमाल करना जानते हैं?

5. एचबीए1सी टेस्ट:

एचबीए1सी को ग्लाइकेटेड हीमोग्लोबिन या सिर्फ़ ए1सी भी कहा जाता है. अब तक डायबिटीज़ का पता लगाने के लिए एचबीए1सी सबसे सटीक टेस्ट है. इस जांच से पिछले 2-3 महीने में आपके ख़ून में शुगर का स्तर पता चल जाता है. ये जानकारी ज़रूरी है, क्योंकि एचबीए1सी का स्तर ज़्यादा होने पर डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियों का ख़तरा बढ़ सकता है.

अगर ए1सी जांच के नतीजे 6.5% या उससे ज़्यादा हैं, तो डायबिटीज़ होना तय है. अगर नतीजे 5.7%-6.4% की रेंज में हैं तो प्री-डायबिटीज़ के हालात हैं. 5.7% से कम का अर्थ है कि आपको डायबिटीज़ नहीं है.

एचबीए1सी  टेस्ट के फ़ायदे:

एचबीए1सी टेस्ट कराने के लिए आपको वक़्त या खाने से जुड़ी पाबंदी या दूसरी ज़रूरतें पूरी नहीं करनी पड़ती. जबकि एफ़पीजी या ओजीटीटी की जांच के लिए आपको वक़्त या खाने से जुड़ी पाबंदी का ख़याल रखना पड़ता है. इस जांच से डायबिटीज़ से जुड़ी दूसरी पेंचीदगियों या परेशानियों, ख़ासकर दिल और नसों की बीमारियों के बारे में भी जानकारी मिलती है. इसके अलावा एचबीए1सी असंतुलित लिपिड प्रोफाइल, यानी ज़्यादा कॉलेस्ट्रॉल, ख़राब एलडीएल कॉलेस्ट्रॉल की ज़्यादा मात्रा और अच्छे कॉलेस्ट्रॉल की कम मात्रा के बारे में भी पूरी जानकारी देता है.[7]

एचबीए1सी टेस्ट की ख़ामियां:

एचबीए1सी टेस्ट आपके ब्लड शुगर को एक अलग तरीक़े से मापता है. जैसे, अगर टेस्ट से ठीक पहले कुछ हफ़्तों में आपको हाईब्लड शुगर था, तो इस टेस्ट के नतीजे इससे ज़रूर प्रभावित होंगे. भले ही टेस्ट से 2 से 3 महीने पहले आपका ग्लूकोज़ लेवल सामान्य रह चुका हो. इसके अलावा एचबीए1सी टेस्ट के परिणाम उम्र और नस्ल के मुताबिक़ भी बदलते हैं. इसलिए, बच्चों के लिए एचबीए1सी के अलावा रैन्डम प्लाज़्मा ग्लूकोज़ (आरपीजी) टेस्ट, ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट (ओजीटीटी) करना आवश्यक है.[8]

वीडियो देखें: डायबिटीज़ में ऐसे रखें दिल का ख़याल

किन्हें एचबीए1सी टेस्ट नहीं कराना चाहिए:

  1. जिन लोगों को सिरोसिस हुआ है, उन्हें एचबी1एसी जांच से फ़ायदा नहीं पहुंचता. सिरोसिस लीवर की बीमारी है, जिसमें लीवर की स्वस्थ कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, और उनकी जगह सकार टिशू (ज़ख़्मी टिशू या ऊतक) ले लेते हैं. इसकी वजह से आगे चलकर लीवर काम करना बंद और इन्सुलिन निकलना रोक देता है, जिससे ख़ून में शुगर का स्तर बढ़ जाता है. जिन लोगों को सिरोसिस होता है उनके शरीर में आयरन की कमी हो जाती है, जिससे रेड ब्लड सेल्स (लाल रक्त कोशिकाएं) की ज़िंदगी कम हो जाती है और एचबी1एसी टेस्ट के नतीजे ग़लत आते हैं. [9]
  2. जो लोग ज़्यादा ख़ून निकलने की स्थिति से उबर रहे होते हैं, या जिनकी किडनी काम करना बंद कर देती है, या जिनके शरीर में ख़ून चढ़ाया गया हो, वैसे लोगों में एचबीए1सी जांच के नतीजे सटीक नहीं आते.

  3. ज़्यादातर लोगों में एचबीए नाम का हीमोग्लोबिन पाया जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ डायबिटीज़ एंड डाइजेस्टिव एंड किडनी डिज़ीज़िज़  (एनआईडीडीके) के मुताबिक़, भारत में कई लोगों में आमतौर पर पाया जाने वाला हीमोग्लोबिन एचबीएस, एचबीसी या एचबीई होता है, ऐसे लोगों के लिए भी ये भरोसेमंद जांच नहीं है.

शोधकर्ताओं का सुझाव है कि सही जांच के लिए तीनों टेस्ट (एफ़पीजी, ओजीटीटी और एचबीए1सी) करवाना ज़रूरी हैं. ऐसा नहीं करने पर समय रहते डायबिटीज़ की पहचान नहीं हो पाती है.[10]

6. फ्रुक्टोज़ामाइन टेस्ट (ग्लाइकेटेड सीरम प्रोटीन या ग्लाइकेटेड एल्ब्यूमिन टेस्ट):

फ्रुक्टोज़ामाइन (एफ़ए) टेस्ट पिछले 2-3 हफ़्तों में ख़ून में शुगर का स्तर जांचता है. ख़ून में मौजूद प्रोटीन के साथ शुगर के मिलने से एफ़ए बनता है. एफ़ए का स्तर बढ़ने पर ख़ून में शुगर का स्तर भी ज़्यादा होगा.

क्योंकि फ्रुक्टोज़ामाइन का 80% हिस्सा एल्ब्यूमिन नाम का प्रोटीन होता है, इसलिए ग्लाइकेटेड एल्ब्यूमिन टेस्ट भी इसके तहत आता है.

एचबीए1सी की तुलना में इस जांच का एक फ़ायदा ये है कि इसमें ख़ून में शुगर के स्तर में आए बदलाव की पहचान जल्द हो जाती है, जिससे इलाज जल्द शुरु हो सकता है.

जब एल्ब्यूमिन का कॉन्सेन्ट्रेशन 5 जी/डीएल हो, तो फ्रुक्टोज़ामाइन का सामान्य रेंज 200-285 एमएमओएल/एल होता है.

ब्लड शुगर की जांच के लिए फ्रुक्टोज़ामाइन (एफ़ए) टेस्ट उस वक़्त किया जाता है, जब:

  • एचबीए1सी टेस्ट भरोसेमंद न हो.
  • कम वक़्त या निर्धारित समय-सीमा से जुड़ी जानकारी चाहिए हो. मसलन, हाल में गर्भवती हुई महिला, जिसे डायबिटीज़ हो और जिसके ख़ून में शुगर का स्तर क़ाबू में करना हो (जेस्टेशनल डायबिटीज़).
  • 2 महीने के भीतर खाने या दवा में लाए गये बदलाव के असर की जांच ज़रूरी हो.
  • कोई सर्जरी होने जा रही हो. एक रिसर्च से पता चला है कि एफ़ए का स्तर 292 एमएमओएल/एल या उससे ज़्यादा होने पर जिस जगह या हिस्से में सर्जरी हुई हो वहां संक्रमण का ख़तरा ज़्यादा होता है.[11]

फ्रुक्टोज़ामाइन टेस्ट किसे नहीं कराना चाहिए:

ये जांच उन मामलों में भरोसेमंद नहीं है अगर आपको:

  • सिरोसिस जैसी लीवर की बीमारी हो.
  • नेफ़्रोटिक सिन्ड्रॉम हो (ये किडनी की एक बीमारी, जिसमें पेशाब से ज़्यादा मात्रा में प्रोटीन निकलता है).
  • थाइरॉयड की समस्या
  • पैराप्रोटीनेमिया (ज़्यादा मात्रा में ट्यूमर की मौजूदगी, जिसके कारण ख़ून में प्रोटीन भरने लगे)  

अगर आपको किडनी की बीमारी है, तो बेहतर होगा कि आप सिर्फ़ ग्लाइकेटेड एल्ब्यूमिन टेस्ट कराएं, क्योंकि ये जांच ग्लाइकेटेड (शुगर प्रभावित) एल्ब्यूमिन और पूरे एल्ब्यूमिन के अनुपात को मापती है, न कि सिर्फ़ ख़ून में मौजूद ग्लाइकेटेड एल्ब्यूमिन को.[12]

सावधानी: जांच से जुड़ा नमूना लेने के 24 घंटे पहले तक ऐसा खाना न खाएं, जिसमें एस्कॉर्बिक एसिड हो.

इलाज के लिए सभी तरह के टेस्ट के अलग-अलग फ़ायदे और नुक़सान होते हैं. इस लेख के ज़रिये हमारा मक़सद जांच से जुड़ी ज़रूरी बातों को लेकर आपकी जानकारी में इज़ाफ़ा करना है.फिर भी, ये आपका डॉक्टर तय करेगा कि आपके शरीर की ज़रूरतों के मुताबिक़ कौन सी जांच सबसे सटीक है.

संदर्भ:

  1. S.I. Sherwan, H.A. Khan, A. Ekhzaimy, A. Masood, M.K. Sakharkar. Significance of HbA1c Test in Diagnosis and Prognosis of Diabetic Patients. Biomarker Insights. 2016. 11:95-104. doi:10.4137/BMI.S38440.
  2. Mayoclinic.org. Diabetes: Diagnosis & Treatment. https://www.mayoclinic.org/diseases-conditions/diabetes/diagnosis-treatment/drc-20371451
  3. P. Brambilla, E. La Valle, R. Falbo, G. Limonta, S. Signorini, F. Cappellini, P. Mocarelli. Normal Fasting Plasma Glucose and Risk of Type 2 Diabetes. Diabetes Care. 2011. 34(6), 1372–1374. http://doi.org/10.2337/dc10-2263.
  4. K. Pippitt, M. Li, H.E. Gurgle. Diabetes Mellitus: Screening and Diagnosis. Am Fam Physician.  2016 Jan. 15;93(2):103-109.
  5. C.L. Meek, H.R. Murphy, D. Simmons. Random plasma glucose in early pregnancy is a better predictor of gestational diabetes diagnosis than maternal obesity. Diabetologia. 2016;59:445-452. doi:10.1007/s00125-015-3811-5.
  6. R.S.Pons, F.C. Rockett, B. de Almeida Rubin, M.L.R. Oppermann, V.L. Bosa. Risk factors for gestational diabetes mellitus in a sample of pregnant women diagnosed with the disease. Diabetology & Metabolic Syndrome. 2015. 7(Suppl 1): A80. doi:10.1186/1758-5996-7-S1-A80.
  7. A. Klisic, N. Kavaric, M. Jovanovic, E. Zvrko, V. Skerovic, A. Scepanovic, A. Ninic. Association between unfavorable lipid profile and glycemic control in patients with type 2 diabetes mellitus. Journal of Research in Medical Sciences : The Official Journal of Isfahan University of Medical Sciences. 2017. 22:122. doi:10.4103/jrms.JRMS_284_17.
  8. H.K. Nam, W.K. Cho, J.H. Kim, Y.J. Rhie, S. Chung, K.H. Lee, B.K. Suh. HbA1c Cutoff for Prediabetes and Diabetes Based on Oral Glucose Tolerance Test in Obese Children and Adolescents. Journal of Korean Medical Science. 2018. 33(12), e93. http://doi.org/10.3346/jkms.2018.33.e93
  9. T. Sehrawat, A. Jindal, P. Kohli, A. Thour, J. Kaur, A. Sachdev, Y. Gupta. Utility and Limitations of Glycated Hemoglobin (HbA1c) in Patients with Liver Cirrhosis as Compared with Oral Glucose Tolerance Test for Diagnosis of Diabetes. Diabetes Therapy. 2018. 9(1), 243–251. http://doi.org/10.1007/s13300-017-0362-4.
  10. D-L Kim, S-D Kim, S.K. Kim, S. Park, K-H Song. Is an Oral Glucose Tolerance Test Still Valid for Diagnosing Diabetes Mellitus? Diabetes & Metabolism Journal. 2016. 40(2):118-128. doi:10.4093/dmj.2016.40.2.118.
  11. N. Shohat, M. Tarabic+B3hi, E.H. Tischler, S. Jabbour, J. Parvizi. Serum Fructosamine: A Simple and Inexpensive Test for Assessing Preoperative Glycemic Control. J Bone Joint Surg Am. 2017. 15;99(22):1900-1907. doi: 10.2106/JBJS.17.00075.
  12. S.H. Senapathi, R. Bhavsar, R. Kaur, P. Kim, I. Sachmechi. A Case Report of Fructosamine’s Unreliability as a Glycemic Control Assessment Tool in Nephrotic Syndrome. Muacevic A, Adler JR, eds. Cureus. 2017. 9(9):e1694. doi:10.7759/cureus.1694.

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