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कॉन्टेंट की समीक्षा अश्विनी एस .कानडे ने की है, वे रजिस्टर्ड डाइटीशियन हैं और 17 सालों से मधुमेह से जुड़ी जानकारी के प्रति लोगों को जागरूक कर रहीं हैं.

आंखें देखने में तो छोटी नज़र आती हैं लेकिन ये कई हिस्सों से मिलकर बना हुआ एक जटिल अंग है, इनमें से कई हिस्से खून में होने वाले मेटाबोलिक बदलावों के प्रति संवेदनशील होते हैं.

मधुमेह यानी डायबिटीज़ के चलते आंखों में सूखापन, धुंधलापन, मोतियाबिंद और रेटिना को प्रभावित करने वाली डायबिटिक रेटिनोपैथी जैसी गंभीर तकलीफ़ें हो सकती हैं.(1) मधुमेह से प्रभावित 20% से 40% लोगों में रेटिनोपैथी की शिकायत होती है. हालांकि, पश्चिमी देशों के मुक़ाबले एशियन महाद्वीप (भारत में 23%) में रेटिनोपैथी के शिकार होने वालों का आंकड़ा कम है.(2) डायबिटीज़ की वजह से लोगों को देखने में तकलीफ़ और कई बार अंधेपन का भी सामना करना पड़ सकता है.

डायबिटीज़, आंखों से जुड़ी तकलीफ़ों की वजह कैसे बनता है 

हाइपरग्लाइसीमिया यानी हाई ब्लड शुगर लेवल उन बलों के सामान्य संतुलन को बिगाड़ता है, जिसकी वजह से  ख़ून कैपिलरिज़ (ब्लड वेसल्स का छोटा कनेक्टर) के भीतर रहता है. नतीजतन,  तरल पदार्थ (फ्लूड) बाहर निकलने लगते हैं  या कैपिलरिज़ ब्लॉक हो जाती हैं. 

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आंखों से जुड़ी कौन-सी बीमारियां हो सकती हैं?

गंभीर डायबिटीक रेटिनोपैथी के चलते आंखों में सूखापन होने जैसी साधारण परेशानी से लेकर अंधापन जैसी गंभीर बीमारियों के होने का ख़तरा होता है. अक्सर डायबिटिक लोग इन बीमारियों से तब तक अनजान होते हैं, जब तक की यह पूरी तरह उन्हें अपनी चपेट में न ले ले.

1. आंखों में सूखापन:

डायबिटीज़ से प्रभावित ज़्यादातर लोग आंखों में होने वाले सूखेपन से पीड़ित होते हैं. हालांकि, बहुत से लोगों में कॉर्निया की सेंसिटिविटी कम हो जाती है, जिससे उन्हें आंखों में हुए सूखेपन की ख़बर नहीं  होती और वे समय पर अपना इलाज नहीं करा पाते.(2) परेशान होने के बजाय आंखों के सूखेपन को गंभीरता से लेना चाहिए. अगर लंबे समय तक इसका इलाज न किया जाए, तो यह ख़तरनाक साबित हो सकता है और आंखों को नुकसान पहुंचा सकता है.

2. इन्फ़ेक्शन:

डायबिटिक लोगों की आंखों में इन्फ़ेक्शन यानी संक्रमण होने के आसार ज़्यादा होते हैं. जैसे कि उनकी पलकों में , कॉर्निया में इन्फ़ेक्शन और कंजक्टिवाइटिस (लाल आंखें) होने की संभावना बनी रहती है. एहतियात के साथ ब्लड शुगर की देखभाल ज़रूरी है और इन्फ़ेक्शन का पता लगने पर जल्द से जल्द इसका इलाज करवाना चाहिए .

3. मोतियाबिंद:

यह डायबिटीज़ में होने वाली आंखों से जुड़ी सबसे आम बीमारी है. आंखों के लेंस यानी पुतली पर परत पड़ने से यह धुंधला हो जाता है. दरअसल लेंस के धुंधलेपन को मोतियाबिंद कहते हैं जिससे आंखों की रोशनी प्रभावित होती है. डायबिटीज़ से प्रभावित बुजुर्गों (65 साल से कम उम्र ) में मोतियाबिंद होने का ख़तरा बाकियों के मुक़ाबले 4 गुना ज़्यादा होता है. हाइपरग्लाइसीमिया से प्रभावित लोगों में मोतियाबिंद होने की गुंजाइश सबसे ज़्यादा होती है, साथ ही प्रीडायबिटीज़ (खाने के पहले ब्लड ग्लूकोज़ लेवल 110 से 125mg/dL) की स्थिति में भी इसके होने का ख़तरा रहता है. अच्छी बात यह है कि ब्लड शुगर लेवल को बहुत अच्छी तरह मैनेज करके डायबिटीज़ की वजह से होने वाले साधारण मोतियाबिंद के ख़तरे को टाला जा सकता है. मोतियाबिंद का इलाज करने के दौरान प्रभावित लेंस को सर्ज़री के ज़रिए निकाला जाता है और उसकी जगह आर्टिफ़ीशियल लेंस लगाया जाता है.(3)

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4. ग्लॉकोम (कांचबिंदु):

यह आंखों के भीतर तरल पदार्थों के दबाव के बढ़ने से संबंधित है. शुरुआती दौर में हो सकता है कि इसके कोई लक्षण नज़र न आएं, पर लंबे समय के बाद आंखों की नसों यानी ऑप्टिक नर्व पर पड़ने वाले  दबाव की वजह से देखने में तकलीफ़ हो सकती है. इलाज न करने पर ग्लॉकोम के लगभग 10% मरीज़ अपनी आंखों की रोशनी पूरी तरह से खो सकते हैं.(3) आंखों के क्लिनिक में ग्लॉकोम होने का पता आसानी से लगाया जा सकता है.

5. डायबिटिक रेटिनोपैथी:

यह डायबिटीज़ में होने वाली आंखों से जुड़ी सबसे गंभीर बीमारी है और बुजुर्गों के अंधेपन का शिकार होने की सबसे आम वजह भी.(2) डायबिटिक रेटिनोपैथी आंखों को प्रभावित करती है और हो सकता है कि इसके कोई भी शुरूआती लक्षण नज़र न आए. इसके होने पर धीरे-धीरे आंखों की रोशनी ख़त्म होने लगती है और कई बार आंखों की रोशनी पूरी तरह से जा सकती है. डायबिटिक रेटिनोपैथी होने की ये तीन अहम वजहें हैं: कितने समय से डायबिटीज़ है, हाइपरग्लाइसीमिया और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप). इसके अलावा बहुत हद तक डायबिटिक रेटिनोपैथी और लाइफ़स्टाइल (लाइफ़स्टाइल से जुड़ी दूसरी बीमारियां) एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. आमतौर पर इसका इलाज हालात को देखते हुए लेज़र या सर्ज़री (panretinal laser photocoagulation या pars-plana vitrectomy)  के ज़रिए किया जाता है. हालांकि, कुछ हद तक दवाएं भी असर करती हैं.(3) अच्छी तरह ब्लड शुगर लेवल को मैनेज करके कुछ लोग साधारण मधुमेह रेटिनोपैथी के 1 या 2 लेवल तक के ख़तरे को टाल सकते हैं.(2)

नियमित जांच कराएं

अगर आपको हाल ही में पता चला है कि आपको डायबिटीज़ या प्रीडायबिटीज़ है, तो हम आपको सलाह देंगे कि आप आंखों के स्पेशलिस्ट से चेकअप करवाएं.(1) साल में एक बार जांच ज़रूर कराना चाहिए क्योंकि आंखों से जुड़ी बीमारियां जब तक पूरी तरह बढ़ ना जाए, इनके लक्षण नज़र नहीं आते. दिखाई न देने, पढ़ने में अचानक तकलीफ़ महसूस होने, रंगों के फ़र्क को समझने में समस्या होने या धब्बे नज़र आने जैसी आंखों की तकलीफ़ से जूझने पर आपको फ़ौरन अपने आंखों की जांच करानी चाहिए. इसके अलावा अगर आप पहले से ही डायबिटिक रेटिनोपैथी कि ज़द मे हैं, तो हालात की गंभीरता को देखते हुए आपके डॉक्टर ख़ुद आपको 3 से 6 महीने में जांच कराने की सलाह देंगे. 

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ख़ास रख-रखाव 

प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाले हॉर्मोनल बदलाव से डायबिटिक रेटिनोपैथी का मामला और भी संजीदा हो जाता है.(1) इसलिए प्रेग्नेंसी के दौरान और भी ज़्यादा ख़याल रखने की ज़रूरत होती है. इसके अलावा, डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों में आंखों की बीमारी होने से किडनी से जुड़ी परेशानियों के होने का भी ख़तरा होता है. इसलिए अक्लमंदी इसी में है कि अगर आपको डायबिटीज़ की वजह से आंखों में तकलीफ़ है, तो आप अपने किडनी की भी जांच करवाएं.

इलाज़ के तरीक़े 

अच्छी बात यह है कि नियमित तौर पर जांच करवाने की आदत से हम ज़्यादातर आंखों की बीमारियों को इसके शुरुआती दौर में ही मालूम कर सकते हैं. आंखों के डॉक्टर आंखों में कॉर्निया, इंट्रोक्युलर के दबाव और रेटिना की जांच करने के लिए कई टूल्स का इस्तेमाल करते हैं. कुछ हालातों में जैसे आंखों में सूखापन जैसी तकलीफ़ों का इलाज दवाओं से ही किया जा सकता है. वहीं दूसरी ओर डायबिटिक रेटिनोपैथी, मोतियाबिंद जैसी बीमारियों के इलाज के लिए सर्ज़री करने की ज़रूरत पड़ती है. 

बचाव के तरीक़े 

आंखों से जुड़ी बीमारियों के जोख़िम को बेहतर ब्लड शुगर लेवल और ब्लड प्रेशर लेवल से कम किया जा सकता है. डायबिटीज़ फ़्रेंडली डाइट खाएं. स्मोकिंग से पूरी तरह बचें और अगर आप शराब पीते हैं, तो इसकी मात्रा को सीमित कर दें.(1) हालांकि इस बात का समर्थन करने वाली ठोस जानकारी की कमी है, लेकिन विटमिन D की कमी, डायबिटिक रेटिनोपैथी के होने में अहम भूमिका निभा सकती है,(2) इसलिए अपने डॉक्टर से ब्लड टेस्ट करवाएं और ज़रूरत हो तो, सप्लीमेंट्स लें.


संदर्भ:

  1. Nentwich MM, Ulbig MW. Diabetic retinopathy-ocular complications of diabetes mellitus. World journal of diabetes. 2015;6(3):489.
  2. Lee R, Wong TY, Sabanayagam C. Epidemiology of diabetic retinopathy, diabetic macular edema and related vision loss. Eye and vision. 2015;2(1):17.
  3. Skarbez K, Priestley Y, Hoepf M, Koevary SB. Comprehensive review of the effects of diabetes on ocular health. Expert review of ophthalmology. 2010;5(4):557-77.

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