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डाइबिटीज़ होने की दो वजहें हैं – शरीर ज़रूरत से कम इंसुलिन बनाता है या फिर बनाए गए इंसुलिन का शरीर पर कोई असर नहीं होता. इन दोनों ही मामलों में, डाइबिटीज़ को मैनेज करने के लिए ऊपर से इंसुलिन लेना पड़ता है जिससे ब्लड शुगर का स्तर बना रहे. लेकिन ऐसी कई बातें हो सकती हैं जिससे इंसुलिन लेने के बावजूद ब्लड शुगर का स्तर नियमित नहीं रहता और इस वजह से हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है यानि कि ब्लड शुगर के स्तर में भारी गिरावट.

आस्था मल्टी स्पेशिलिटी सेंटर, अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली के वरिष्ठ सलाहकार फिजिशियन, डॉ. रतन कुमार वैश्य,से जानें कि इंसुलिन पर बने रहने के दौरान हाइपोग्लाइसीमिया से निपटने के लिए आपको क्या करना चाहिए. 

इंसुलिन ले रहे डाइबिटीज़ के मरीज़ों में हाइपोग्लाइसीमिया होने की वजह क्या है?

डॉ. वैश्य के मुताबिक़, “इंसुलिन आपकी हाई ब्लड शुगर के स्तर को कंट्रोल करने के लिए होता है, इसीलिए नहीं कि ब्लड शुगर को इतने नीचे ले आए कि हाइपोग्लाइसीमिया की नौबत आ जाए. अगर आप इंसुलिन ले रहे हैं और आपके ब्लड शुगर का स्तर अचानक नीचे गिर जाए तो समझिए कि कुछ गड़बड़ है. हाइपोग्लाइसीमिया होने की दो वजहें हो सकती हैं; या तो आप इंसुलिन सही समय पर नहीं ले रहे हैं या फिर ज़रूरत से ज़्यादा इंसुलिन ले रहे हैं जिससे शुगर का स्तर नॉर्मल रेंज से कम हो रहा है. 

हाइपोग्लाइसीमिया ख़तरे की घंटी क्यों है?

अगर आपकी ब्लड शुगर का स्तर 150-250 मिलीग्राम/डीएल की रेंज में रहता है, तो ज़्यादा परेशानी की कोई बात नहीं है. लेकिन आपको चक्कर आना, चिढ़चिढ़ापन, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, कमज़ोरी, और सांस लेने में हल्की परेशानी होना जैसी शिकायतें हो सकती हैं. और अगर इन लक्षणों को समय रहते पहचानकर उपचार नहीं किया गया तो आपकी ब्लड शुगर का स्तर 100 मिलीग्राम/डीएल या उससे भी कम तक पहुंच सकता है.

अगर ब्लड शुगर का स्तर 60 मिलीग्राम/डीएल तक गिर गया तो गंभीर परेशानी हो सकती है. ऐसी हालत में अगर शुगर स्तर को तुरंत ठीक नहीं किया गया तो मरीज़ बेहोश हो सकता है, उसे फिट आ सकते हैं या फिर वह कोमा में भी जा सकता है. बुज़ुर्ग मरीज़ों के साथ ऐसा होने की संभावना ज़्यादा होती है क्योंकि रात में सोते समय उनकी ब्लड शुगर का स्तर अचानक बिलकुल नीचे गिर सकता है. ऐसे मामले जानलेवा साबित हो सकते हैं.

उस दशा में क्या करें जब इंसुलिन लेने के बाद आप हाइपोग्लाइसिमिक हो गए हैं?

थोड़ी राहत महसूस होने पर डॉक्टर को अपनी हाइपोग्लाइसीमिया के बारे में बताएं जिससे वह आपके गिरते ब्लड शुगर के स्तर की वजहों के बारे मे आपको बता सके. आपका डॉक्टर आपको अपने भोजन के समय में और इंसुलिन लेने के समय में बदलाव करने की सलाह दे सकता है.

इंसुलिन लेते समय हाइपोग्लाइसीमिया से बचाव कैसे करें?

डाइबिटीज़ के मरीज़ों को हाइपोग्लाइसीमिया से बचाने के लिए डॉ. वैश्य कुछ सुझाव दे रहे हैं:

  1. हाइपोग्लाइसीमिया को लेकर सजग रहें 

डॉ. वैश्य के मुताबिक़, हाइपोग्लाइसीमिया जिन हालातों में हो सकता है, उन हालातों को लेकर सजग रहना इस मुश्किल से निपटने का सबसे अच्छा तरीक़ा है. “डॉक्टर हमेशा मरीज और उसके परिवार को इंसुलिन लेने के सही समय के बारे में बताते हैं जिससे इसी के मुताबिक़ मरीज़ खाना खाने का समय तय कर सके. अगर आप डाइबिटोलोजिस्ट के बताए गए शैड्यूल को सही तरह से मानते हैं तो आप ब्लड शुगर के स्तर में गिरावट आने जैसी स्तिथी से आसानी से बच सकते हैं,” डॉ. वैश्य कहते हैं. 

  1. खाना खाने का समय बांधें

आप अपने दिन का पहला भोजन या भोजन की पहली ख़ुराक सुबह जागने के 15 मिनट के अंदर खा लें. चाहे एक रोटी खाएं, बिना चीनी का एक बिसकुट या एक फल खाएं. अगर रात में आपके ब्लड शुगर स्तर में गिरावट आई है, तो ऐसा करने से वह संभाल जाएगा. दिन में तीन बार भारी भोजन करने की जगह हर दो घंटे के अंतराल पर थोड़ा-थोड़ा करके कुछ न कुछ खाते रहें. ऐसा करने से आपका ब्लड शुगर स्तर दिनभर एक जैसा बना रहेगा.

  1. खाने के लिए समय निकालें

ज़्यादातर ऐसा होता है कि कामकाज में मशगूल लोग अपनी डाइबिटीज़ को मैनेज करने के लिए समय निकाल पाने में मशक्कत करते नज़र आते हैं. सुबह जल्दबाज़ी में वे नाश्ता किए बिना घर से निकाल जाते हैं या फिर मीटिंग में फंसे होने की वजह से इंसुलिन की डोज़ लेना भूल जाते हैं. ऐसा करने से ब्लड शुगर के स्तर पर बुरा असर पड़ता है. इसीलिए, अपने लिए समय ज़रूर निकालें. अगर आप अक्सर ऐसा करना भूल जाते हैं तो अपने परिवार, दोस्तों या सहकर्मियों से आपको याद दिलाने के लिए कहें या फिर अपने फोन पर खाना खाने और इंसुलिन की डोज़ लेने का समय याद दिलाने के लिए रिमाइंडर सेट कर लें.

वीडियो देखें: डायबिटीज़ से छुटकारा पाना भी है मुमकिन!  

  1. इंसुलिन को ठीक तरह से स्टोर करके रखें

इंसुलिन की डोज़ और खाने के समय के अलावा हाइपोगलाइसीमिया के वजह इंसुलिन की असर करने की क्षमता भी हो सकती है. इंसुलिन के असरदार होने के लिए उसे कम टेम्प्रेचर पर स्टोर करना ज़रूरी है. अगर इसे फ्रिज में नहीं रखा जाता तो इसका असर ख़त्म हो सकता है, यानि कि आपको ब्लड शुगर स्तर बनाए रखने के लिए इंसुलिन ज़्यादा मात्रा में लेना पड़ेगा. लेकिन इसमें ख़तरा यह होता है कि अगर इंसुलिन की डोज़ नापतोल के नहीं ली गई तो हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है. मौसम में बदलाव होने पर भी इंसुलिन के असरदार होने पर फ़र्क पड़ता है. इसीलिए इंसुलिन को सही तरीक़े से स्टोर करने में लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए.

  1. इंसुलिन का इंजेक्शन सही तरीक़े से लगाएं

इंसुलिन का इंजेक्शन सही तरीक़े से न लगाने से भी ब्लड शुगर के स्तर में फेर-बदल हो सकता है. कभी-कभी गलत तरीक़े से इंजेक्शन लगाने की वजह से इंसुलिन तेज़ रफ़्तार से ख़ून में घुल जाता है जिससे शुगर स्तर में तुरंत गिरावट आ जाती है.

  1. शारीरिक मेहनत करने से बचें 

अगर आपने हाल ही में इंसुलिन लिया है तो ऐसे में शारीरिक मेहनत वाले भारी कामों से बचें. जिनमें ज़्यादा ऊर्जा खर्च होने से आपको हाइपोग्लाइसीमिया हो सकता है. जिन धावकों और खिलाड़ियों को डाइबिटीज़ है, उन्हें इस बात का ख़ास ख़याल रखना चाहिए. उन्हें अपने डाइटीशियन या डाइबिटोलॉजिस्ट की निगरानी में ही कसरत करनी चाहिए.

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  1. अपने ब्लड शुगर स्तर की नियमित रूप से ख़ुद जांच करें 

अपने ब्लड शुगर के स्तर को नियमित रखने के लिए आपको उसकी नियमित रूप से जांच करनी होगी. असरदार तरीक़े से ख़ुद अपने ब्लड शुगर स्तर की जांच (एसएमबीजी) करने से आपको इंसुलिन की डोज़ की मात्रा और खाने का समय तय करने के साथ ही हाइपोग्लाइसीमिया के होने के अंदेशे के बारे में भी मदद मिलती रहेगी.

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