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दिल को दुरुस्त रखने के लिए शारीरिक व्यायाम यानी एक्सरसाइज़ पर काफ़ी ज़ोर दिया जाता है. एक्सरसाइज़ करने से हार्ट की मांसपेशियां मज़बूत बनती हैं, ब्लड प्रेशर को काबू में करने में मदद मिलती है, और हार्ट की ख़ून को पंप करने की क्षमता भी बढ़ती है जिससे पूरे शरीर तक ख़ून अच्छी तरह से पहुंच पाता है. इसीलिए दिल की बीमारी से प्रभावितों को एक्सरसाइज़ करने की सलाह दी जाती है. हालांकि, एक्सरसाइज़ कितनी देर तक और कितनी बार करनी चाहिए, यह दिल की बीमारी की हालत को देखकर तय किया जाता है. ऐसे मरीज़ जिन्हें हाल ही में दिल का दौरा पड़ा है या जिन्हें सर्जरी से गुज़रना पड़ा है, उन्हें एक्सरसाइज़ फिर शुरू करने से पहले बेहद सतर्क रहने की ज़रूरत है, क्योंकि यह उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं और उनकी सेहत बिगाड़ सकती हैं.

अगर आपको दिल से जुड़ी कोई बीमारी है, तो यहां कुछ सुझाव दिए गए हैं ताकि आप सुरक्षित ढंग से एक्सरसाइज़ कर सकें

1. डॉक्टर की सलाह लें:

व्यायाम शुरू करने से पहले, अपने डॉक्टर से कुछ चीज़ों के बारे में बात करना ज़रूरी है. आपका डॉक्टर ही आपकी हालत देखकर, यह सही-सही बता सकता है कि क्या आप एक्सरसाइज़ शुरू कर सकते हैं, एक सप्ताह में आपको कितनी एक्सरसाइज़ करनी चाहिए, और आपको किस व्यायाम के साथ शुरुआत करनी चाहिए. एम्स के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. संदीप मिश्रा बताते हैं, “सबसे अच्छा तरीका है, हर रोज़ संतुलित ढंग से एक्सरसाइज़ करें, बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ न करें. फिर धीरे-धीरे एक्सरसाइज़ का वक़्त और रफ़्तार बढ़ाते जाएं.”

2. आसान एक्सरसाइज़ के साथ शुरुआत करें:

वे सुझाव देते हैं, “एक्सरसाइज़ कई तरह की होती हैं: आइसोटोनिक, आइसोमेट्रिक और स्ट्रेचिंग. आइसोटोनिक एक्सरसाइज़ में चलना, टहलना और तैराकी शामिल हैं. ये एक्सरसाइज़ मांसपेशियों को मज़बूती देती है और आपके पूरे शरीर पर इसका असर नज़र आता है. चलना शायद सबसे आसान आइसोटोनिक एक्सरसाइज़ है जिसके साथ आप शुरुआत कर सकते हैं. धीरे-धीरे वक़्त के साथ, आप अपने दिन भर के क़दमों की गिनती बढ़ा सकते हैं.”

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3. थका देने वाली एक्सरसाइज़ से बचें: 

आइसोमेट्रिक एक्सरसाइज़ में शरीर को बहुत ज़्यादा हिलना-डुलना नहीं पड़ता है. इनमें एक वक़्त में मांसपेशियों पर एक बराबर ज़ोर डाला जाता है या प्रतिरोध (resistance) के साथ ज़ोर लगाया जाता है. ऐसी एक्सरसाइज़ से दिल की मांसपेशियों पर ज़रूरत से ज़्यादा दबाव पड़ सकता है और सीने में दर्द उभर सकता है, जिससे दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा बढ़ जाता है. डॉ. मिश्रा सुझाव देते हैं कि जिन रोगियों को पहले कभी दिल का दौरा पड़ चुका है, उन्हें इन एक्सरसाइज़ से ख़ासतौर पर बचना चाहिए, भले ही उनकी हालत में कितना ही सुधार क्यों न आ गया हो.

4. बहुत ज़्यादा नमी या ठंडे तापमान में एक्सरसाइज़ करने से बचें:

एक और अहम पहलू है, बहुत ज़्यादा नमी या बहुत ज़्यादा ठंडे तापमान में एक्सरसाइज़ करने से बचना. वे कहते हैं, “हद से ज़्यादा नमी और हद से ज़्यादा ठंड, दोनों ही चीज़ें दिल की बीमारी के मरीज़ों के लिए अच्छे नहीं हैं. नमी की वजह से जल्दी थकान  होने लगती है और शरीर में पानी की कमी हो जाती है, जबकि ठंड की वजह से सांस लेने में दिक्कत होती है. घर के अंदर ही एक्सरसाइज़ करना सुरक्षित होता है, लेकिन वह भी सिर्फ़ तब, जब तापमान सही हो.”

5. शरीर में पानी की कमी न होने दें :

एक्सरसाइज़ के दौरान शरीर में पानी की कमी होना दिल की बीमारी से प्रभावित लोगों के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हो सकता है. वे कहते हैं, “मरीज़ों को अच्छे से पानी पीना चाहिए; नींबू पानी एक अच्छा विकल्प हो सकता है.”

6. जानें कब रुकना है:

इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि आप कितने दिनों से हर रोज़ एक्सरसाइज़ कर रहे हैं, आपको अपने शरीर की आवाज़ सुननी चाहिए. अगर एक्सरसाइज़ करते वक़्त अगर असहज हों या दर्द महसूस करें, तो फ़ौरन एक्सरसाइज़ रोक दें. सांस फूलना, ठंड लगना, प्यास से गला सूखना, चक्कर आना, सीने में दर्द होना, दिल की धड़कन तेज़ होना और घबराहट होना, ये सभी ख़तरे की घंटी हैं. अगर आपको इनमें से कोई भी परेशानी महसूस होती है, तो एक्सरसाइज़ फिर से शुरू करने से पहले अपने डॉक्टर को इस बारे में ज़रूर बताएं.

7. सुस्ताना न भूलें:

एक्सरसाइज़ करने के तुरंत बाद, सीधे अपने रोज़मर्रा के काम में न जुट जाएं. अपने शरीर को आराम पहुंचाने वाली एक्सरसाइज़ और गहरी सांस लेते हुए हल्की-फुल्की स्ट्रेचिंग करें ताकि आपके दिल की धड़कन नियमित हो सके यानी न धीमी और न तेज़.

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