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अनीता को 10 साल पहले पता चला था कि उन्हें टाइप-2 डायबिटीज़ है और तब से, उन्होंने इसे कंट्रोल में रखने के लिए हर मुमकिन सावधानी बरती है. वे रोज़ाना एक्सरसाइज़ करती हैं, सेहतमंद डाइट लेती हैं, स्ट्रेस यानी तनाव से दूर रहने की पूरी कोशिश करती हैं और नियमित तौर से समय पर अपनी दवाएं लेती हैं. फिर भी, जब उन्होंने हाल में अपना चेक-अप करवाया, तो उन्हें इंसुलिन शॉट्स लेना शुरू करने के लिए कहा गया. अब अनीता को लगता है कि वह अपने डायबिटीज़ को सही तरह से कंट्रोल नहीं कर सकीं और उनकी सारी मेहनत बेकार चली गई. वह इंसुलिन शॉट्स लेने की बात से बहुत परेशान हुईं.

अनीता जैसे कई लोग हैं जो इंसुलिन शॉट लेने की ख़बर पर ऐसी ही प्रतिक्रिया देते हैं. हालांकि, उन्हें ये समझने की ज़रूरत है कि डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखना बहुत आसान नहीं है और इसके लिए सिर्फ़ एक्सरसाइज़ और डाइट पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है. इसके अलावा, हर इंसान के लिए डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखने के तरीके अलग होते हैं. वे इस मामले में किसी और व्यक्ति से मुक़ाबला नहीं कर सकते.

जैसा कि आप अच्छी तरह से जानते हैं, टाइप 1 डायबिटीज़ और टाइप 2 डायबिटीज़ होते है. टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटो-इम्यून डिज़ीज़ है जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम शरीर के सभी इंसुलिन पैदा करने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देती है. इंसुलिन एक हॉर्मोन है जो पैन्क्रियाज़ के ज़रिए बनाया जाता है और आपके शरीर को इसकी ज़रूरत होती है जिससे आपका शरीर खाने से मिलने वाले ग्लूकोज़ को ऊर्जा में बदल सके. इंसुलिन आपके ब्लड ग्लूकोज़ को बहुत ज़्यादा (हाइपरग्लाइसीमिया) या बहुत कम (हाइपोग्लाइसीमिया) होने से बचाने के लिए अहम है.

टाइप 1 डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों को इंसुलिन या तो इंजेक्शन या पम्प की मदद से लेना पड़ता है, ताकि वे बिना किसी तकलीफ़ के ज़िंदगी गुज़ार सकें. हालांकि, टाइप 2 डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों के लिए इंसुलिन की ज़रूरत हो भी सकती है और नहीं भी. इसका पूरा दारोमदार इस बात पर होता है कि टाइप 2 डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों के शरीर में क्या चल रहा है, ख़ास करके पैन्क्रियाज़ किस तरह से इंसुलिन जेनरेट का रहा है. अगर पैन्क्रियाज़ उतना इंसुलिन नहीं जेनरेट कर पाता जितना शरीर को ग्लूकोज़ को ऊर्जा में बदलने के लिए होती है, तो शरीर को इंसुलिन की ज़रूरत होती है.

कभी-कभी, शरीर की कोशिकाएं, शरीर में मौजूद इंसुलिन का इस्तेमाल नहीं कर पाती और इंसुलिन का प्रतिरोध कर सकती हैं, इसे आमतौर पर इंसुलिन सेंसिटिविटी या इंसुलिन रेज़िस्टेंस (इंसुलिन प्रतिरोध) के तौर पर जाना जाता है. जिस व्यक्ति के साथ ऐसा होता है, उन्हें ऐसे लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा इंसुलिन की ज़रूरत होती है, जिन्हें डायबिटीज़ या इंसुलिन सेंसिटिविटी या रेज़िस्टेंस न हो. सेहतमंद डाइट लेने, रोज़ाना एक्सरसाइज़ करने और वज़न घटाने से इंसुलिन लिए बिना ही ब्लड ग्लूकोज़ लेवल को एक सामान्य सीमा तक लाने में मदद मिल सकती है. कुछ ओरल मेडिसिन यानी दवाएं ऐसी हैं जो पैन्क्रियाज़ के ज़रिए स्वाभाविक तौर पर पैदा करने वाले इंसुलिन का इस्तेमाल करने में शरीर को ज़्यादा सक्षम बनाने में मदद करती हैं. कुछ दवाएं पैन्क्रियाज़ को ज़्यादा इंसुलिन पैदा करने में प्रभावी बनाती हैं. अगर इन दवाओं को नियमित तौर पर लिया जाए और जैस अकी पहले बताया गया, डाइट और एक्सरसाइज़ पर भी ज़ोर दिया जाए, तो इंसुलिन शॉट्स लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. लेकिन सच बात तो ये है, ज़िंदगी में किसी भी चीज़ की गैरंटी नहीं दी जा सकती, यहां सबकुछ मुमकिन होता है.

जैसा कि हमने ऊपर लेख में बताया, अनीता की तरह, ऐसे कई लोग जो सालों से डायबिटीज़ की दवाइयां खाकर, डाइट और एक्सरसाइज़ करके खुद को सेहतमंद बनाए हुए हैं, हो सकता है कि अब उनका शरीर ब्लड ग्लूकोज़ को सामान्य रेंज में नहीं रख पा रहा हो. यह सामान्य है और बड़े पैमाने पर ये माना जाता है कि ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि सालों से इंसुलिन रेज़िस्टेंस को दूर रखने के लिए इंसुलिन को हद से ज़्यादा बनाने के लिए शरीर की इंसुलिन-उत्पादक कोशिकाओं की क्षमता कम हो गई होगी.

इसलिए अगर आप खुद को अनीता जैसी परिस्थिति में महसूस करते हैं, तो ऐसा न समझें कि आपसे गलती हो गई है और अप डायबिटीज़ को कंट्रोल करने में नाकामयाब हो गए हैं. अगर आपके डॉक्टर ने आपको इंसुलिन लेने की सलाह दी है, तो इसे सकारात्मक नज़रिए से देखें और ये समझें कि इंसुलिन लेने से आप लंबे समय तक डायबिटीज़ की वजह से होने वाली समस्याओं से बचे रहेंगे. इसके अलावा, बिलकुल पहले की तरह सेहतमंद डाइट और एक्सरसाइज़ करते रहें.

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