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राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस के मौके पर कुछ बातें यूं ही ज़हन में आ जाती हैं, जैसे बचपन में मां से मिली थपकी, लोरी, उनकी गोद. कहते हैं मां के आंचल में जन्नत होती है, दुनिया में सबसे सच्ची मोहब्बत रिश्ता मां का होता है. इसीलिए यह दिन हम सभी के लिए और ख़ास हो जाता है.

हम सभी के जीवन में मां सबसे अज़ीज़ होती हैं. मां के लिए समर्पित इन तमाम किस्से कहानियों और एहसासों में कई मां और शिशु ऐसे भी होते हैं, जिन्हें वह सुख नहीं मिल पाता. क्योंकि कई दफ़ा कुपोषण या लापरवाही के चलते मां और शिशु की सेहत बिगड़ जाती है. कुछ गंभीर मामलों में तो माता या शिशु की जान पर बन आती है.

इसीलिए हम सभी को मिलकर, भविष्य में बनने वाली माताओं और नौनिहालों से ये वादा करने की ज़रूरत है कि हम:

  • सुरक्षित सेहत के लिए ज़रूरी सभी सुविधाएं उन तक पहुंचाएंगे  
  • उन्हें सभी सरकारी एवं निजी स्वास्थ्य सेवाओं की जानकारी मुहैया कराएंगे
  • घर, रास्ता, ऑफिस कहीं भी उन्हें किसी भी चीज़ के लिए परेशान नहीं होने देंगे
  • दवा, दूध, वाहन जैसी ज़रूरतों में हमेशा उनकी मदद के लिए आगे आएंगे
  • अस्पतालों में सबसे अच्छी सुविधा देने और दिलवाने की कोशिश करेंगे
  • गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं की किसी भी ज़रूरत को अनदेखा नहीं करेंगे

ये ज़िम्मेदारियां किसी एक व्यक्ति की न होकर सामाजिक ज़िम्मेदारी है.

विश्व भर में गर्भ या जन्म के दौरान हर रोज़ लगभग 830 महिलाओं की मौत उन वजहों से होती है, जिनसे बचा जा सकता है.(1) हालांकि भारत में गर्भ के दौरान होने वाली मृत्यु दर में कमी आई है,(2) पर थोड़ी सी कोशिश और जागरूकता के साथ हम आने वाले कल को और भी बेहतर बना सकेंगे.

मां और शिशु की सेहत में ख़राबी के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार है गर्भ के दौरान उचित खानपान की कमी या इससे जुड़ी सही जानकारी का अभाव.  

जिसके लिए कुछ क़दम हमारे साथ ही महिलाओं को भी उठाने होंगे.

आप गर्भवती हैं, तो इन सलाहों को ज़रूर अपनाएं.

  • सुबह के नाश्ते में सेहतमंद चीज़ें ज़रूर शामिल करें.
  • फ़ाइबर से भरपूर सब्ज़ी फल वग़ैरह खाएं.
  • डॉक्टर की दी गई आयरन और फॉलिक एसिड सहित सभी दवाएं सही मात्रा और सही वक़्त पर रोज़ाना लें.
  • फल ज़रूर खाएं, लेकिन खाने के पहले फल को अच्छी तरह से धो लें, वरना इंफ़ेक्शन का ख़तरा होता है.
  • प्रेग्नेंसी के दौरान अंडा, चिकन या मछली खाएं, पर इन्हें अच्छी तरह पकाने के बाद.
  • ज़्यादा से ज़्यादा प्रोटीन खाएं इससे बच्चे का बेहतर विकास होगा जिसके लिए आप अपने खाने में दाल, बीज, दूध वाली चीज़ों को शामिल करें.
  • बाहर की चीज़ों को खाने से बचें.
  • नियमित पानी पीते रहें.
  • आरामदायक कपड़े पहनें.

    यहां जानें:
    नारियल पानी पीने के नुक़सान-फ़ायदे 

ध्यान रहे हर तरह के पोषक तत्व आपके लिए ज़रूरी हैं, इसलिए बाक़ायदा एक्सपर्ट्स की निगरानी में अपना डायट चार्ट बनाएं और उसके मुताबिक़ चलें.

यहां जानें: डायबिटीज़-फ़्रेंडली डाइट प्लान

कई बार गर्भ के दौरान महिलाएं जेस्टेशनल डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, एनीमिया जैसी परेशानियों की शिकार हो जाती हैं.(3) जिनमें से जेस्टेशनल डायबिटीज़ के होने पर मां और बच्चे की सेहत पर आगे भी असर हो सकता है.

जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलिटस क्या है?

गर्भावस्था के समय होने वाले डायबिटीज़ को जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलेटस कहते हैं.

खाने से पहले ख़ून में शुगर का स्तर (एफबीएस) >90 मिलीग्राम/डीएल और खाने के बाद (पीपीबीएस) < 140 मिलीग्राम/डीएल होना गर्भ के समय डायबिटीज़ होने की पहचान है. आमतौर पर करीब 24वें हफ़्ते की गर्भावस्था में कई महिलाओं को डायबिटीज़ हो जाता है, जिनमें लगभग 18% में जेस्टेशनल डायबिटीज़ की मौजूदगी पाई जाती है.[4]

ज़रूरत से ज़्यादा वज़न वाली महिलाएं या जिन महिलाओं के परिवार में पहले से डायबिटीज़ हो, और पिछली बार गर्भावस्था में जिन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज़ की परेशानी हुई हो, उनमें दूसरी महिलाओं की तुलना में जेस्टेशनल डायबिटीज़ होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. इतना ही नहीं, जिन महिलाओं को पहले जेस्टेशनल डायबिटीज़ रहा हो, उनमें आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज़ होने की संभावना 20% से 50% ज़्यादा होती है.[5] इसके होने पर डायबिटोलोजिस्ट से नियमित जांच और शुगर को काबू में रखने के लिए सलाह के मुताबिक़ इंसुलिन या टैबलेट लेना भी ज़रूरी है.

वीडियो देखें: जानें क्या होता है HbA1C? 

अगर गर्भ के दौरान किसी महिला के ख़ून में शुगर का लेवल ज़्यादा है, तो उसके बच्चे पर ये असर पड़ सकते हैं –

  • मैक्रोसोमिया – पैदा हुए बच्चे का सिर सामान्य से बड़ा होना.
  • बच्चे का वजन ज़रूरत से ज़्यादा होना.
  • दिल की बीमारी जैसी जन्मजात परेशानियां होना.
  • डायबिटीज़ से प्रभावित माताओं के बच्चे भी आगे चलकर डायबिटिक हो सकते हैं.
  • इसके अलावा जेस्टेशनल डायबिटिक महिलाओं के बच्चों का आगे चलकर बौद्धिक विकास रुक सकता है.[6]
  • जन्म से पहले बच्चे की अचानक मृत्यु होना.

पुणे सह्याद्री हॉस्पिटल में डायबिटीज़ की विशेषज्ञ डॉ. वैशाली पाठक के मुताबिक़ अगर ख़ून में शुगर का स्तर बेक़ाबू हो जाए, तो टाइप 1 या टाइप 2 डायबिटीज़ गर्भ को एक समान प्रभावित कर सकते हैं. यानी जब ख़ून में शुगर का फास्टिंग स्तर 90 से ज़्यादा और पोस्टप्रैंडियल स्तर (खाने के बाद) 140 से ज़्यादा हो.

टाइप 1 डायबिटीज़ से प्रभावित महिलाओं में मृत्यु का ख़तरा और डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियां ज़्यादा होती हैं.

मां और शिशु के मामले में आप इन ज़रूरी बातों का रखें ख़याल

खाने की ज़्यादा मात्रा नहीं उसका सही होना अहम् है

प्रेगनेंसी के दौरान और डिलीवरी के बाद होने वाले ख़तरों के लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार होता है ग़लत तरीक़े का खानपान और सुस्त लाइफ़स्टाइल. लिहाजा ये दोनों ही स्थितियां मां और शिशु की सलामती के लिए ठीक नहीं. इसलिए प्रेगनेंसी के दौरान और इसके बाद भी ज़रूरी है कि मां अपना खानपान अच्छा रखे और एक्टिव रहें. ज़रूरी बात, सारी देखभाल के बीच किसी भी वैक्सीनेशन को अनदेखा न करें.

एक्टिव रहना न भूलें

एक्टिविटी की ज़रूरत पूरी करने के लिए आप एक्सपर्ट की निगरानी में घर या बाग़ बगीचे में इंडोर या आउटडोर एक्सरसाइज़ करें. आप चाहें तो घर के कुछ काम, स्विमिंग, डांस या योग के ज़रिए भी ख़ुद को एक्टिव रख सकती हैं.

इसे भी पढ़ें : एक्सरसाइज़ के दौरान डायबिटिक ना भूलें ये 10 बातें

डॉक्टर से तालुक बनाएं रखें  

प्रेग्नंट होने के तुरंत बाद से नियमित डॉक्टर के संपर्क में बने रहें. सभी ज़रूरी जांच करवाएं. बच्चे की सुरक्षा के लिहाज़ से किए जाने वाले सभी टेस्ट करें और उनके मेडिकल रिकॉर्ड अपने पास रखें.

शिशु की तैयारी में ज़रूरी बात

डिलीवरी के बाद भी बच्चे को सभी ज़रूरी टीके लगवाएं. इस तरह की चीज़ें खाएं पिएं जिससे बच्चे को ज़्यादा से ज़्यादा अपना दूध पिला सकें. बढ़ती उम्र के साथ दवा और टीकों के अलावा बच्चे के तेल, दूध की बोतल, साबुन, डायपर, डायट जैसी छोटी-बड़ी हर चीज़ जानकारों की निगरानी में तय करें.

अपनों का साथ दे ख़ुशनुमा एहसास

प्रेगनेंसी महिलाओं के जीवन का सबसे अहम और नाजुक दौर होता है. जिसमें उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा सावधान और ख़ुश रहने की ज़रूरत होती है. ऐसे में परिवार के सभी सदस्यों और ख़ासकर पिता की यह ज़िम्मेदारी है कि उनका पूरा ख़याल रखें.

संदर्भ

  1. https://www.who.int/health-topics/news-room/fact-sheets/detail/maternal-mortality
  2. http://www.searo.who.int/mediacentre/features/2018/india-groundbreaking-sucess-reducing-maternal-mortality-rate/en/
  3. https://www.nichd.nih.gov/health/topics/pregnancy/conditioninfo/complications  
  4. Letícia Nascimento Medeiros Bortolon, Luciana de Paula Leão Triz, Bruna de Souza Faustino, Larissa Bianca Cunha de Sá1, Denise Rosso Tenório Wanderley Rocha, Alberto Krayyem Arbex. Gestational Diabetes Mellitus: New Diagnostic Criteria. Open Journal of Endocrine and Metabolic Diseases, 2016, 6, 13-19. Available at – https://file.scirp.org/pdf/OJEMD_2016011414330750.pdf
  5. Centers for Disease Control and Prevention. National Diabetes Fact Sheet: General Information and National Estimates on Diabetes in the United States, 2005. Atlanta, GA: US Department of Health and Human Services, Centers for Disease Control and Prevention; 2005.
  6. Mann JR, Pan C, Rao GA, McDermott S, Hardin JW. Children born to diabetic mothers may be more likely to have intellectual disability. Matern Child Health J. 2013 Jul;17(5):928-32. Available at – https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/22798077

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