reduce risk colorectal cancer diabetes
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कंटेंट की समीक्षा: अश्विनी एस कनाडे ने की है, वे रजिस्टर्ड डाइटीशियन हैं और 17 सालों से मधुमेह से जुड़ी जानकारियों के प्रति लोगों को जागरुक कर रहीं हैं.

डायबिटीज़ हो तो जीवन में आगे चलकर इससे जुड़ी दूसरी परेशानियों के होने का ख़तरा बना रहता है. जिसमें किडनी और दिल की बीमारियों का होना काफ़ी आम है. लेकिन इसके अलावा भी आपको कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे हो सकता है आप अनजान हों. 

नए रिसर्च में पाया गया है कि डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों में बड़ी आंत के कैंसर की संभावना ज़्यादा होती है.[1] इसे कोलोरेक्टल कैंसर के नाम से भी जाना जाता है. डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों में अन्य लोगों के मुक़ाबले कोलोरेक्टल कैंसर होने की संभावना 30% ज़्यादा होती है.[2] इतना ही नहीं, मोटापे की वजह से इसकी संभावना और बढ़ जाती है. मोटापा, डायबिटीज़ से ग्रसित लोगों के बीच एक आम चीज़ है. पर अच्छी ख़बर यह है कि इससे बचा जा सकता है

कोलोरेक्टल कैंसर दिखने में किस तरह का होता है?

कोलोरेक्टल कैंसर, बड़ी आंत (कोलन और रेक्टम) का कैंसर होता है. ख़ून की कमी, मलाशय से ख़ून आना और पेट में दर्द होना इसके कुछ अस्पष्ट लक्षण माने जाते हैं. इन लक्षणों को देखकर कैंसर का अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है. ये लक्षण कैंसर के काफ़ी आगे बढ़ जाने के बाद ही साफ़ तौर पर सामने आते हैं. अच्छी बात ये है कि समयसमय पर कराए जाने वाले स्टूल और कोलनस्कोपी जैसे टेस्ट सेकैंसर की पहचान आसानी से की जा सकती है. मेडिकल गाइडलाइन के मुताबिक़ कैंसर की संभावना वाले लोगों को कुछ सालों के अंतराल पर ज़रूरी टेस्ट कराते रहना चाहिए. अगर परिवार में किसी सदस्य को कोलोरेक्टल कैंसर हो, तो परिवार के दूसरे सदस्यों में इसके होने के आसार बढ़ जाते हैं. एक बार कैंसर की पहचान हो जाने के बाद, ज़्यादातर मामलों में सर्जरी की मदद से इसका आसानी से इलाज किया जा सकता है.

डायबिटीज़ और कोलोरेक्टल कैंसर में क्या संबंध है?

टाइप 2 के डायबिटीज़ होने की मुख्य वजह इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता है, इंसुलिन के सामान्य स्तरों के लिए कोशिकाएँ प्रतिक्रिया नहीं दे पातीं, जिससे ख़ून में शुगर लेवल बढ़ जाता है. ख़ून में शुगर के बढ़े हुए स्तर को संतुलित करने के लिए ख़ून में इंसुलिन की मात्रा भी बढ़ जाती है. इसे मेडिकल विज्ञान की ज़ुबान में हाइपरइंसुलिनेमिया कहते हैं, और यही कोलोरेक्टल कैंसर के होने वजह होती है.[1] दूसरे शब्दों में कहें तो, हाइपरइंसुलिनेमिया के ख़तरे वाले टाइप 2 डायबिटीज़ की वजह से कोलोरेक्टल कैंसर होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

इसके अलावा जानिए, क्या स्तन कैंसर का डायबिटीज़ से कोई संबंध है?

डायबिटीज़ के अलावा किन चीज़ों से कोलोरेक्टल कैंसर ख़तरा बढ़ सकता है?

  • कम फ़ाइबर (रेशे) वाला आहार लेने से.( क्योंकि जिन लोगों के आहार में फ़ाइबर की मात्रा ज़्यादा होती है, उन्हें कैंसर होने का ख़तरा कम होता है).
  • वेस्टर्न फ़ूड (पश्चिमी आहार), जिसमें रेड मीट (बीफ़), रिफ़ाइन किए हुए अनाज (पास्ता, व्हाइट ब्रेड वगैरह) और शक्कर वाली चीज़ें (मिठाई) शामिल होती हैं.[3]
  • धूम्रपान से.
  • ज़्यादा शराब पीना (दिशानिर्देशों के अनुसार हर दिन एक गिलास से ज़्यादा शराब नहीं पीनी चाहिए और अल्कोहल की कम मात्रा वाली बीयर या वाइन पीनी चाहिए).

क्या पुरुष और महिलाओं पर इसका असर एक जैसा होता है?

पुरुषों और महिलाओं में, डायबिटीज़ बढ़ने के साथसाथ कोलोरेक्टल कैंसर का ख़तरा भी बढ़ता जाता है. लेकिन, पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं में इसका ख़तरा ज़्यादा होता है. हालांकि, पुरुषों में डायबिटीज़ होने से पहले की स्थिति में भी कैंसर होने का ख़तरा ज़्यादा होता है.

इसमें वज़न की क्या भूमिका है?

शारीरिक गतिविधि कम करना या बिल्कुल  करना और कमर के हिस्से के आसपास वसा यानी फ़ैट का जमा होना सीधा-सीधा इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े हैं. सुस्त लाइफ़स्टाइल और ज़्यादा कैलोरी वाले आहार को लेना, डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों में कोलोरेक्टल कैंसर के ख़तरे को बढ़ाते हैं. ख़तरा तब और बढ़ जाता है जब कोई व्यक्ति 4 साल या उससे ज़्यादा वक़्त से मोटापे से जूझ रहा हो.

कोलोरेक्टल कैंसर के ख़तरे को कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?

कैंसर के ख़तरे को कम करने के लिए इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता में कमी लाने और ख़ून में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए. संतुलित आहार, कसरत, वज़न (अगर ओवरवेट/मोटापा हो) कम करके और दवाइयों के ज़रिए इसके ख़तरे को कम किया जा सकता है.

  1. आहार

  • ग्लूकोज़ या इंसुलिन के स्तर में बढ़ोतरी करने वाली खानेपीने की चीज़ों का सेवन कम करें या बिल्कुल करें. रिफ़ाइन किया हुआ अनाज इसका एक बेहतरीन उदाहरण है.
  • फ़ाइबर वाली चीज़ें ज़्यादा खाएँ.
  • खानेपीने की ऐसी चीज़ों से बचें, जिनका ग्लाइसेमिक इंडेक्स ज़्यादा होता हो.

    2. कसरत

  • कई दशकों से, वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि किस तरह की कसरत कितनी देर के लिए की जाए कि इंसुलिन प्रतिरोधक क्षमता को कम किया जा सके. हालांकि, अभी तक इस बारे में कोई ठोस शोध सामने नहीं आया है, लेकिन हर हफ़्ते 3-5 बार मध्यम तीव्रता वाली कसरत करने से इंसुलिन संवेदनशीलता को कम किया जा सकता है. लेकिन, यह कसरत हर हफ़्ते कुल मिलाकर 120 मिनट तक होनी चाहिए.
  • कुछ अध्ययनों से यह बात भी सामने आई है कि हर हफ़्ते कुल मिलाकर 170 मिनट तक छोटेछोटे समय के अंतराल पर ज़्यादा तीव्रता वाली कसरत करने से अच्छे नतीजे हासिल किए जा सकते हैं.

    वीडियो को देखें और जानिए डायबिटीज़ में व्यायाम क्यों इतना ज़रूरी है?

जाँच का समय तय करने के लिए अपने डॉक्टर से सलाह लें. इस बात का ध्यान रखें कि अपने ख़ून में शक्कर की मात्रा को नियंत्रित करके आप सिर्फ़ कोलोरेक्टल कैंसर के ख़तरे को कम कर सकते हैं बल्कि डायबिटीज़ से जुड़ी कई बीमारियों के ख़तरे को भी कम कर पाते हैं.

 

संदर्भ:

  1. Guraya SY. Association of type 2 diabetes mellitus and the risk of colorectal cancer: A meta-analysis and systematic review. World Journal of Gastroenterology: WJG. 2015 May 21;21(19):6026. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4438039/
  2. Peeters PJ, Bazelier MT, Leufkens HG, de Vries F, De Bruin ML. The risk of colorectal cancer in patients with type 2 diabetes: associations with treatment stage and obesity. Diabetes Care. 2015 Mar 1;38(3):495-502. http://care.diabetesjournals.org/content/38/3/495.short
  3. Meyerhardt JA, Niedzwiecki D, Hollis D, Saltz LB, Hu FB, Mayer RJ, Nelson H, Whittom R, Hantel A, Thomas J, Fuchs CS. Association of dietary patterns with cancer recurrence and survival in patients with stage III colon cancer. Jama. 2007 Aug 15;298(7):754-64. https://jamanetwork.com/journals/jama/fullarticle/208423

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