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ये बात साबित हो चुकी है कि महिलाओं के डायबिटीज़ से ग्रसित होने की वजह पुरुषों से अलग होती है.[1] इसके लिए मुख्य रूप से दोनों लिंगों में हार्मोन की बनावट का अलग होना भी ज़िम्मेदार होता हैं.

टाइप 2 डायबिटीज़ एक क्रॉनिक लो-ग्रेड इन्फ्लेमेट्री डिज़ीज़ है और महिलाओं में इसकी निशानियां, पहचान और इसका विस्तार पुरुषों की तुलना में अलग होता हैं.

डॉ. वैशाली पाठक पुणे के सह्याद्री हॉस्पिटल में डायबिटीज़ की विशेषज्ञ हैं. उनके मुताबिक़, महिलाओं में डायबिटीज़ से जुड़े चार अलग लक्षण और निशानियां पाई जाती हैं:

  • पॉलिसिस्टिक ओवरी सिन्ड्रॉम (पीसीओएस): अक्सर महिलाएं पीसीओएस की वजह से डायबिटीज़ से ग्रसित होती है, जिससे उनके शरीर में इन्सुलिन के लिए प्रतिरोध पैदा होता है. दरअसल, महिलाओं में बांझपन और मोटापे के लिए भी यही ज़िम्मेदार होता है. इसकी मुख्य निशानियां हैं- सिर के बालों का पतला होना, मुंहासे होना और पूरे शरीर में बाल पैदा होना.
  • यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शंस (यूटीआईज़): ख़ून में शुगर का स्तर ज़्यादा होने के चलते महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शंस की परेशानी ज़्यादा गंभीर होती है. ये डायबिटीज़ की सामान्य निशानी है. पेशाब में शुगर की मौजूदगी से बैक्टीरिया के पनपने में मदद करता है.
  • वजाइनल (योनी से जुड़ा) या ओरल यीस्ट इन्फेक्शन: डायबिटीज़ से ग्रसित महिलाओं ख़ासकर जिनका शुगर का स्तर बेक़ाबू रहता है, उनमें वजाइनल यीस्ट और फंगल इंफेक्शन का ख़तरा ज़्यादा होता है. खुजली, दर्द और योनी से होने वाला रिसाव वजाइनल यीस्ट के लक्षण होते हैं.
  • वजाइनल ड्राइनेस या कामेच्छा में कमी: डायबिटीज़ से ग्रसित महिलाओं को यौन कार्यों में परेशानी हो सकती है. साथ ही ख़ून के बहाव में परेशानी और ज़्यादा गंभीर मामलों में नसों को नुक़सान भी हो सकता है (डायबिटिक न्यूरोपेथी).

जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलेटस क्या है

गर्भावस्था के समय होने वाले डायबिटीज़ को जेस्टेशनल डायबिटीज़ मेलेटस कहते हैं.

खाने से पहले खून में शुगर का स्तर (एफबीएस) >90 मिलीग्राम % और खाने के बाद (पीपीबीएस) < 140 मिलीग्राम/डीएल होना गर्भ के समय डायबिटीज़ होने की पहचान है. आमतौर पर करीब 24वें हफ़्ते की गर्भावस्था में कई महिलाओं को डायबिटीज़ हो जाता है, जिनमें लगभग 18% में जेस्टेशनल डायबिटीज़ की मौजूदगी पाई जाती है. [2]

ज़रूरत से ज़्यादा वज़नदार महिलाएं या जिन महिलाओं के परिवार में पहले से डायबिटीज़ हो, और पिछली बार गर्भावस्था में जिन महिलाओं को जेस्टेशनल डायबिटीज़ की परेशानी हुई हो, उनमें दूसरी महिलाओं की तुलना में जेस्टेशनल डायबिटीज़ होने का ख़तरा ज़्यादा रहता है. इतना ही नहीं, जिन महिलाओं को पहले जेस्टेशनल डायबिटीज़ रहा हो, उनमें आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज़ होने की संभावना 20% से 50% ज़्यादा होती है. [3]

गर्भवती महिला को जेस्टेशनल डायबिटीज़ का पता लगाने के लिए उन्हें ओरल ग्लूकोज़ टॉलरेंस टेस्ट ज़रूर कराना चाहिए. उचित पौष्टिक आहार, व्यायाम और दवाओं की मदद से जेस्टेशनल डायबिटीज़ पर आसानी से क़ाबू पाया जा सकता है.

इसे भी देखें: क्या आप डायबिटीज़ से जुड़े इस ज़रूरी टेस्ट के बारे में जानते हैं?

गर्भ और डायबिटीज़:

डायबिटीज़ से ग्रसित महिलाओं को गर्भधारण से पहले अपने ख़ून में शुगर के स्तर को क़ाबू में रखना ज़रूरी है, जिससे भ्रूण के विकास में किसी तरह की परेशानी न हो. उचित आहार, व्यायाम की मदद से वो गर्भावस्था के दौरान शुगर का स्तर काबू में रख सकती हैं. डायबिटोलोजिस्ट से नियमित जांच और शुगर को काबू में रखने के लिए सलाह के मुताबिक़ इन्सुलिन या टैबलेट लेना भी ज़रूरी है.

अगर गर्भ के दौरान किसी महिला के खून में शुगर का स्तर ज़्यादा है, तो उसके बच्चे पर ये असर पड़ सकते हैं –

  • मैक्रोसोमिया – पैदा हुए बच्चे का सिर सामान्य से बड़ा होना.
  • बच्चे का वजन ज़रूरत से ज़्यादा होना.
  • दिल की बीमारी जैसी जन्मजात परेशानियां हो सकती हैं.
  • डायबिटीज़ से ग्रसित माताओं के बच्चे भी आगे चलकर डायबिटिक हो सकते हैं. इसके अलावा जेस्टेशनल डायबिटिक
  • महिलाओं के बच्चों का आगे चलकर बौद्धिक विकास रुक सकता है. [4]
  • जन्म से पहले बच्चे की अचानक मृत्यु होना.डॉ. वैशाली पाठक के मुताबिक़ टाइप 1 या टाइप 2 डायबिटीज़ गर्भ को एक समान प्रभावित कर सकते हैं, अगर ख़ून में शुगर का स्तर बेक़ाबू हो जाए. यानी जब ख़ून में शुगर का फास्टिंग स्तर 90 से ज़्यादा और पोस्टप्रैंडियल स्तर (खाने के बाद) 140 से ज़्यादा हो.

    टाइप 1 डायबिटीज़ से ग्रसित महिलाओं में मृत्यु का ख़तरा और डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियां ज़्यादा होती हैं.

    इसे भी पढ़ें: डायबिटीज़ और अच्छी नींद : जानें कितने घंटे की नींद है आपके लिए ज़रूरी

    डायबिटीज़ किसी को भी हो सकता है. उम्र, लिंग, जाति या लाइफ़स्टाइल का इससे कोई लेना-देना नहीं है. लेकिन रिसर्च बताती हैं कि टाइप 1 डायबिटीज़ में लिंग के आधार पर मरने वालों की दर में फ़र्क होता है.

    26 अध्ययनों से मिले आंकड़ों से पता चला है कि टाइप 1 डायबिटीज़ से ग्रसित महिलाओं में मृत्यु का ख़तरा पुरुषों के मुक़ाबले लगभग 40% ज़्यादा होता है. इतना ही नहीं, टाइप 1 डायबिटीज़ से ग्रसित पुरुषों की तुलना में उनमें नसों से सामान्य और गंभीर बीमारियों का ख़तरा दोगुना होता है.[5]

    दरअसल एक और रिसर्च के मुताबिक[6], पिछले कुछ सालों में महिलाओं की मृत्यु दर में कोई कमी नहीं आई है, जबकि पुरुषों का मृत्यु दर काफी कम हुआ है. इस रिसर्च के मुताबिक लिंग के आधार पर डायबिटीज़ में फ़र्क की वजह ये हैं:

  • महिलाओं में डायबिटीज़ और उससे जुड़ी परेशानियों की गंभीरताओं का पता लगाना पुरुषों की तुलना में ज़्यादा कठिन है.
  • महिलाओं के शरीर में जिस तरह से हॉर्मोन काम करते हैं, वो पुरुषों से बिलकुल अलग होते हैं.
  • महिलाओं में डायबिटीज़ के लक्षण अलग होते हैं.
  • महिलाओं में दिल की बीमारियों का प्रकार भी पुरुषों की तुलना में अलग हो सकता है.
  • महिलाओं की तुलना में पुरुषों में डायबिटीज़ और दिल से जुड़ी बीमारियों के इलाज की संभावना ज़्यादा असरदार होती है.

    डॉ. पाठक के मुताबिक, “भारतीय महिलाओं में पुरुषों की तुलना में मृत्यु दर ज़्यादा होती है. साथ ही शरीर में वसा की ज़्यादा मात्रा होने की वजह से उनमें पुरुषों की तुलना में डायबिटीज़ से जुड़ी परेशानियां भी दोगुनी होती हैं. सेहत को लेकर लापरवाही, खाने में कोताही और लाइफस्टाइल में बदलाव किये बिना दवाएं लेना महिलाओं में ज़्यादा ख़तरा पैदा करता है.”

    कंटेंट की समीक्षा:
    अश्विनी एस कनाडे, रजिस्टर्ड डाइटीशियन हैं और वो 17 सालों से मधुमेह से जुड़ी जानकारियों के प्रति लोगों को जागरुक कर रहीं हैं.

    तथ्यों की जांच: आदित्य नर, बी.फ़ार्मा, एमएससी, पब्लिक हेल्थ एंड हेल्थ इकोनॉमिक्स.

    संदर्भ:

  1. Enza Gucciardi, Shirley Chi-Tyan, Margaret DeMelo, Lina Amaral, and Donna E. Stewart. Characteristics of men and women with diabetes; Observations during patients’ initial visit to a diabetes education centre. Official Publication for the College of Family Physicians of Canada. February 2008. Available at: https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC2278314/
  2. Letícia Nascimento Medeiros Bortolon, Luciana de Paula Leão Triz, Bruna de Souza Faustino, Larissa Bianca Cunha de Sá1, Denise Rosso Tenório Wanderley Rocha, Alberto Krayyem Arbex. Gestational Diabetes Mellitus: New Diagnostic Criteria. Open Journal of Endocrine and Metabolic Diseases, 2016, 6, 13-19. Available at – https://file.scirp.org/pdf/OJEMD_2016011414330750.pdf
  3. Centers for Disease Control and Prevention. National Diabetes Fact Sheet: General Information and National Estimates on Diabetes in the United States, 2005. Atlanta, GA: US Department of Health and Human Services, Centers for Disease Control and Prevention; 2005.
  4. Mann JR, Pan C, Rao GA, McDermott S, Hardin JW. Children born to diabetic mothers may be more likely to have intellectual disability. Matern Child Health J. 2013 Jul;17(5):928-32. Available at – https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pubmed/22798077
  5. Rachel R Huxley, Sanne A E Peters, Prof Gita D Mishra, Prof Mark Woodward. Risk of all-cause mortality and vascular events in women versus men with type 1 diabetes: a systematic review and meta-analysis. The Lancet Diabetes & Endocrinology. February 2015. Available at –http://www.thelancet.com/journals/landia/article/PIIS2213-8587%2814%2970248-7/abstract
  6. Edward W. Gregg, Qiuping Gu, Yiling J. Cheng, K. M. Venkat Narayan, Catherine C. Cowie. Mortality Trends in Men and Women with Diabetes, 1971 to 2000. Annals of Internal Medicine Logo. Available at – http://annals.org/aim/article/735918/mortality-trends-men-women-diabetes-1971-2000

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